॥ अध्याय 9, श्लोक 31 ॥

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ 9.31 ॥

धार्मिक व्याख्या

कृष्ण कहते हैं: वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परम शान्ति को प्राप्त होता है। हे कुन्तीपुत्र! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता।

आध्यात्मिक मर्म: यह कृष्ण की सबसे बड़ी प्रतिज्ञा है। जैसे ही मन परमात्मा की ओर मुड़ता है, वह शुद्ध होने लगता है। 'नाश न होने' का अर्थ है कि भक्त कभी अपने मार्ग से भटकता नहीं और न ही उसे संसार के कष्ट पराजित कर सकते हैं। आपके IIT-Bombay के संघर्ष में भी यह श्लोक संबल देता है कि सच्चा प्रयास और समर्पण कभी व्यर्थ नहीं जाता।

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