मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः... (32)
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ 33 ॥
कृष्ण कहते हैं: हे पार्थ! स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनि वाले जो कोई भी हों, वे भी मेरी शरण होकर परम गति को प्राप्त होते हैं। फिर पुण्यशील ब्राह्मणों और भक्त राजर्षियों के विषय में तो कहना ही क्या! इसलिए इस सुख रहित और क्षणभंगुर संसार को प्राप्त होकर तू निरंतर मेरा ही भजन कर।
आध्यात्मिक मर्म: भगवान के यहाँ कोई भेदभाव नहीं है। वे योग्यता नहीं, केवल शरणागति देखते हैं। यहाँ संसार को 'असुखम्' (जहाँ स्थायी सुख नहीं है) कहा गया है ताकि मनुष्य सांसारिक मोह छोड़कर शाश्वत सत्य की खोज करे।