मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥ 9.34 ॥
कृष्ण कहते हैं: मुझमें मन वाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझे नमस्कार कर। इस प्रकार आत्मा को मुझमें जोड़कर और मेरे परायण होकर तू मुझको ही प्राप्त होगा।
आध्यात्मिक मर्म: यह अध्याय 9 का अंतिम संदेश है। कृष्ण यहाँ चार सरल काम बता रहे हैं: 1. मन को परमात्मा में लगाना। 2. प्रेम करना (भक्त)। 3. कर्मों को अर्पित करना (यज्ञ)। 4. अहंकार को त्यागना (नमस्कार)। यही वह 'राजविद्या' है जो जीवन के हर लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक है।