॥ अध्याय 9, श्लोक 5-6 ॥

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्... (5)
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥ 6 ॥

धार्मिक व्याख्या

कृष्ण कहते हैं: वे सब प्राणी मुझमें स्थित नहीं हैं; मेरे इस ईश्वरीय योग की शक्ति को देख! मैं प्राणियों का पोषण करने वाला और सृजन करने वाला हूँ, फिर भी मेरा 'स्व' (आत्मा) उनमें स्थित नहीं है। जैसे महान और सर्वत्र विचरने वाली वायु सदा आकाश में स्थित रहती है, वैसे ही सब प्राणी मुझमें स्थित हैं, ऐसा जान।

आध्यात्मिक मर्म: यह उपमा बहुत प्रसिद्ध है। जैसे हवा आकाश में बहती है, आकाश हवा को जगह देता है, पर हवा आकाश को गंदा या प्रभावित नहीं कर सकती। वैसे ही संसार भगवान में है, पर भगवान संसार के विकारों से अछूते हैं।

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