सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्... (7)
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः... (8)
कृष्ण कहते हैं: हे कुन्तीपुत्र! कल्प के अंत में सब प्राणी मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं और कल्प के आदि में मैं उन्हें फिर से रचता हूँ। अपनी प्रकृति को वश में करके, स्वभाव के वशीभूत हुए इस संपूर्ण प्राणी-समुदाय को मैं बार-बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ।
आध्यात्मिक मर्म: सृष्टि का निर्माण कोई 'एक्सीडेंट' नहीं है। यह एक चक्रीय प्रक्रिया है। जैसे बीज से पेड़ और पेड़ से फिर बीज बनता है, वैसे ही आत्माएं प्रकृति के माध्यम से बार-बार प्रकट और विलीन होती हैं।