॥ अध्याय 9, श्लोक 9-10 ॥

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥ 9 ॥
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ 10 ॥

धार्मिक व्याख्या

कृष्ण कहते हैं: हे धनंजय! उन कर्मों में आसक्ति न होने के कारण और उदासीन (neutral) की तरह स्थित मुझे वे कर्म नहीं बाँधते। मेरी अध्यक्षता में प्रकृति चराचर सहित पूरे जगत को रचती है। इसी कारण से यह संसार-चक्र घूम रहा है।

[Image: The Sun shining on earth. The sun's light makes plants grow and water evaporate, but the sun doesn't 'do' these things intentionally; its mere presence (अध्यक्षता) ही काफी है]

आध्यात्मिक मर्म: यह प्रबंधन (Management) का उच्चतम स्तर है। भगवान केवल अपनी उपस्थिति से प्रकृति को शक्ति देते हैं, और प्रकृति खुद काम करती है। वे किसी को पुरस्कार या दंड देने के लिए 'व्यक्तिगत' रूप से हस्तक्षेप नहीं करते, बल्कि उनके द्वारा बनाए गए नियम (Law of Karma) काम करते हैं।

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