॥ श्लोक 13 ॥

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥

धार्मिक व्याख्या

उस समय अर्जुन ने देवों के देव भगवान कृष्ण के उस शरीर में, अनेक प्रकार से विभाजित संपूर्ण ब्रह्मांड को एक ही जगह स्थित देखा।

आध्यात्मिक मर्म: यहाँ 'प्रविभक्तम्' (अलग-अलग बँटा हुआ) शब्द का अर्थ है कि अनेक लोक, ग्रह और जीव होने के बावजूद, वे सब ईश्वर के एक ही शरीर के भीतर समाए हुए थे। अनेकता में एकता का यह साक्षात दर्शन था।

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