॥ श्लोक 16 ॥

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥

धार्मिक व्याख्या

हे विश्वेश्वर! हे विश्वरूप! मैं आपको सब ओर अनेक भुजाओं, पेटों, मुखों और नेत्रों से युक्त तथा अनंत रूपों वाला देख रहा हूँ। मैं न आपका अंत देख पा रहा हूँ, न मध्य और न ही आदि (आरंभ)।

आध्यात्मिक मर्म: भगवान असीम हैं। समय और स्थान (Space and Time) की सीमाएं उन पर लागू नहीं होतीं। वे अनादि और अनंत हैं, यही अर्जुन यहाँ साक्षात अनुभव कर रहे हैं।

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