अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचित्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥
वे देवताओं के समूह आप में ही प्रवेश कर रहे हैं। कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपके नाम और गुणों का कीर्तन कर रहे हैं। महर्षियों और सिद्धों के समूह कल्याण हो ऐसा कहकर श्रेष्ठ स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं।
आध्यात्मिक मर्म: यहाँ यह दिखाया गया है कि उच्च कोटि के जीव और देवता भी भगवान की महानता के सामने नतमस्तक हैं। वे जानते हैं कि अंततः सब कुछ उन्हीं में विलीन होना है।