रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥
हे महाबाहो! आपके अनेक मुखों और नेत्रों वाले, अनेक भुजाओं, जांघों और पैरों वाले, अनेक पेटों वाले और अनेक विकराल दाढ़ों वाले इस महान रूप को देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हैं और मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ।
आध्यात्मिक मर्म: अर्जुन यहाँ अपनी मानवीय कमजोरी स्वीकार कर रहे हैं। ईश्वर का पूर्ण सत्य इतना विशाल और तीव्र है कि वह मन को भयभीत कर सकता है। यह 'काल' का वह रूप है जो सब कुछ भस्म करने वाला है।