नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥
हे विष्णु! आकाश को स्पर्श करने वाले, देदीप्यमान, अनेक वर्णों वाले, खुले हुए मुख और चमकते हुए विशाल नेत्रों वाले आपको देखकर मेरा अंतःकरण भयभीत है। मुझे न धैर्य मिल रहा है और न शांति।
आध्यात्मिक मर्म: अर्जुन की व्याकुलता चरम पर है। जब जीव ईश्वर के अनंत ऐश्वर्य और उग्र रूप को एक साथ देखता है, तो उसकी बुद्धि काम करना बंद कर देती है। यहाँ 'विष्णु' संबोधन उनकी सर्वव्यापकता को दर्शाता है।