दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥
दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलय काल की अग्नि के समान आपके मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जान पा रहा हूँ और न शांति पा रहा हूँ। हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हों।
आध्यात्मिक मर्म: प्रलय की अग्नि सब कुछ नष्ट कर देती है। अर्जुन को भगवान के मुख वैसे ही लग रहे हैं। वे प्रार्थना कर रहे हैं कि भगवान अपने इस उग्र रूप को शांत करें और अपना सौम्य रूप दिखाएँ।