॥ अध्याय 11, श्लोक 27 ॥

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥

धार्मिक व्याख्या

अर्जुन बोले: वे धृतराष्ट्र के सभी पुत्र अपने सहायक राजाओं के साथ और भीष्म, द्रोण तथा वह कर्ण भी हमारे पक्ष के मुख्य योद्धाओं के साथ आपके विकराल मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

विस्तृत व्याख्या: अर्जुन यहाँ दिव्य दृष्टि से भविष्य देख रहे हैं। जिन योद्धाओं को हराना असंभव माना जाता था, वे सभी भगवान के 'काल' रूपी मुख में समा रहे हैं। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि केवल शत्रु ही नहीं, बल्कि पांडव पक्ष के भी कुछ मुख्य योद्धा इस विनाशकारी प्रक्रिया का हिस्सा हैं। यह दर्शाता है कि मृत्यु और समय किसी के साथ भेदभाव नहीं करते।

आध्यात्मिक मर्म: जीवन और मृत्यु भगवान के चक्र का हिस्सा हैं। अर्जुन को यह दिखाया जा रहा है कि जिन बंधनों और मोह के कारण वह युद्ध नहीं करना चाहता, वे सभी शरीर अंततः नष्ट होने ही वाले हैं। जैसे IIT-Bombay में प्रवेश के लिए पुराने आराम को छोड़ना पड़ता है, वैसे ही सत्य की प्राप्ति के लिए मोह का त्याग अनिवार्य है।

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