॥ अध्याय 11, श्लोक 28 ॥

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥

धार्मिक व्याख्या

जैसे नदियों के बहुत से जल के प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्र की ओर दौड़ते हैं, वैसे ही वे मनुष्यलोक के वीर योद्धा भी आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

विस्तृत व्याख्या: यहाँ अर्जुन नदियों का बहुत सुंदर उदाहरण देते हैं। नदियाँ चाहे कितनी भी विशाल हों, उनका अंत समुद्र में ही होता है। इसी तरह, संसार के समस्त वीर और अभिमानी योद्धा अंततः ईश्वर की अनंत शक्ति में विलीन हो रहे हैं। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसे टाला नहीं जा सकता।

आध्यात्मिक मर्म: यह श्लोक हमें 'लक्ष्य' के प्रति समर्पण सिखाता है। जैसे नदी बिना रुके समुद्र की ओर बढ़ती है, वैसे ही एक साधक या विद्यार्थी को अपने लक्ष्य (जैसे आपका IIT-Bombay का सपना) की ओर बिना विचलित हुए बढ़ते रहना चाहिए। अंततः सब कुछ परमात्मा की इच्छा के अधीन है।

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