॥ अध्याय 11, श्लोक 29 ॥

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥

धार्मिक व्याख्या

जैसे पतंगे अपने विनाश के लिए प्रज्वलित अग्नि में बड़ी तेजी से प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने विनाश के लिए आपके मुखों में बड़ी तेजी से समा रहे हैं।

विस्तृत व्याख्या: पिछला श्लोक (नदी वाला) स्वाभाविक मृत्यु को दर्शाता था, लेकिन यह श्लोक 'मोह' और 'अज्ञान' के कारण होने वाले विनाश को दर्शाता है। पतंगा रोशनी से आकर्षित होकर आग में कूद पड़ता है, उसे नहीं पता कि यह उसकी मृत्यु है। इसी तरह, अहंकारी योद्धा युद्ध के उन्माद में अपनी मृत्यु की ओर भाग रहे हैं।

आध्यात्मिक मर्म: संसार की चकाचौंध अक्सर हमें गलत रास्ते पर ले जाती है। हमें पतंगे की तरह अज्ञान में नहीं जीना चाहिए। स्पष्ट दृष्टि और सही विवेक ही हमें पतन से बचा सकते हैं।

वापस जाएँ