॥ अध्याय 11, श्लोक 31 ॥

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥

धार्मिक व्याख्या

मुझे बताइए कि उग्र रूप वाले आप कौन हैं? हे देवश्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो, आप प्रसन्न होइए। मैं आपको, जो आदिपुरुष हैं, तत्व से जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी चेष्टा को नहीं समझ पा रहा हूँ।

विस्तृत व्याख्या: अर्जुन अब पूरी तरह से असमंजस में हैं। वे कृष्ण को अपना मित्र मानते थे, लेकिन इस भयानक रूप को देखकर उनकी बुद्धि काम नहीं कर रही। वे जानना चाहते हैं कि इस महाविनाश के पीछे का दिव्य उद्देश्य क्या है। जब हमारे जीवन में भी कठिन चुनौतियाँ आती हैं, तो हम अक्सर ईश्वर से यही पूछते हैं—मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है?

आध्यात्मिक मर्म: यह एक जिज्ञासु का प्रश्न है। ईश्वर के प्रति भय नहीं, बल्कि उन्हें समझने की तीव्र इच्छा ही ज्ञान का द्वार खोलती है।

वापस जाएँ