॥ अध्याय 11, श्लोक 32 ॥

श्रीभगवानुवाच :
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥

धार्मिक व्याख्या

श्रीभगवान बोले: मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय मैं इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। तेरे युद्ध न करने पर भी, विपक्षी सेनाओं में स्थित ये सभी योद्धा जीवित नहीं बचेंगे।

विस्तृत व्याख्या: यहाँ भगवान अपना परिचय 'काल' (समय) के रूप में देते हैं। काल ही वह शक्ति है जो पुरानी सृष्टि को मिटाकर नई सृष्टि के लिए जगह बनाती है। भगवान अर्जुन का अहंकार मिटा रहे हैं—वे कह रहे हैं कि यह मत सोच कि तू युद्ध करेगा तभी ये लोग मरेंगे, इनका अंत तो पहले ही निश्चित हो चुका है।

आध्यात्मिक मर्म: 'Time Management' का सबसे बड़ा सबक यही है। समय किसी का इंतजार नहीं करता। परिणाम ईश्वर के हाथ में है, हमें केवल अपना कर्म करना चाहिए।

वापस जाएँ