॥ अध्याय 11, श्लोक 33 ॥

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥

धार्मिक व्याख्या

अतः तू उठ! यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से संपन्न राज्य का भोग कर। ये सब योद्धा मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तू तो केवल निमित्त मात्र (माध्यम) बन जा।

विस्तृत व्याख्या: 'निमित्त मात्र' शब्द गीता का सबसे महत्वपूर्ण उपदेश है। भगवान कह रहे हैं कि अर्जुन, तू तो बस एक औजार (Instrument) है, असली काम तो मैं पहले ही कर चुका हूँ। यहाँ 'सव्यसाचिन्' का अर्थ है वह जो दोनों हाथों से तीर चला सके। भगवान कह रहे हैं कि तेरी काबिलियत अपनी जगह है, लेकिन जीत का श्रेय ईश्वर को ही जाना चाहिए।

आध्यात्मिक मर्म: जब आप IIT-Bombay के लिए पढ़ाई करते हैं, तो खुद को 'कर्ता' न समझें। बस अपना सर्वश्रेष्ठ दें और यह मानें कि सफलता ईश्वर की कृपा का परिणाम है। इससे तनाव खत्म हो जाता है।

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