स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥
अर्जुन बोले: हे हृषीकेश! यह योग्य ही है कि आपके नाम और महिमा के कीर्तन से जगत हर्षित हो रहा है और अनुराग को प्राप्त हो रहा है। राक्षस लोग डरकर दिशाओं में भाग रहे हैं और सभी सिद्धगण आपको नमस्कार कर रहे हैं।
विस्तृत व्याख्या: अर्जुन यहाँ स्वीकार कर रहे हैं कि भगवान की सत्ता कितनी न्यायपूर्ण है। जहाँ भक्त और सज्जन लोग ईश्वर के विराट रूप को देखकर आनंदित हैं, वहीं अधर्मी और राक्षसी प्रवृत्ति वाले लोग भयभीत होकर भाग रहे हैं। 'हृषीकेश' का अर्थ है इंद्रियों के स्वामी, जो यह दर्शाता है कि भगवान हमारे भीतर के भावों को भी नियंत्रित करते हैं।
आध्यात्मिक मर्म: जब हम सच्चाई के मार्ग पर चलते हैं, तो सकारात्मक ऊर्जा (सिद्धगण) हमारा साथ देती है और नकारात्मक विचार (राक्षस) दूर भागने लगते हैं।