कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥
हे महात्मन्! वे आपको नमस्कार क्यों न करें? आप ब्रह्मा के भी आदि कर्ता और सबसे बड़े हैं। हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! आप अक्षर स्वरूप हैं, आप ही सत् (व्यक्त), असत् (अव्यक्त) और उनसे परे जो परब्रह्म हैं, वह आप ही हैं।
विस्तृत व्याख्या: यहाँ अर्जुन भगवान कृष्ण को सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा से भी श्रेष्ठ बता रहे हैं। वे कह रहे हैं कि आप केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि वह तत्व हैं जो शाश्वत है (अक्षर) और जो इस पूरे ब्रह्मांड का आधार है।