नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥
हे सर्वस्वरूप! आपको आगे से नमस्कार, पीछे से नमस्कार और सब ओर से नमस्कार! आप अनन्त सामर्थ्य और असीम पराक्रम वाले हैं। आपने समस्त जगत को व्याप्त कर रखा है, इसलिए आप ही सब कुछ हैं।
विस्तृत व्याख्या: ईश्वर केवल मंदिर में नहीं, बल्कि कण-कण में हैं। अर्जुन को अब हर दिशा में ईश्वर ही दिखाई दे रहे हैं।