पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥
आप इस चर-अचर जगत के पिता हैं, आप ही परम पूजनीय और सबसे बड़े गुरु हैं। हे अतुलनीय प्रभाव वाले! तीनों लोकों में आपके समान भी कोई दूसरा नहीं है, फिर आपसे अधिक तो कोई कैसे हो सकता है?