अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥
जो पहले कभी नहीं देखा गया, ऐसे आपके रूप को देखकर मैं हर्षित हूँ, परंतु मेरा मन भय से व्याकुल भी हो रहा है। अतः हे देव! आप मुझे अपना वही (चतुर्भुज) रूप दिखाइए। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइए।
आध्यात्मिक मर्म: ईश्वर का विराट रूप ज्ञान तो देता है, लेकिन भक्ति और प्रेम के लिए उनके सौम्य और मानवरूपी स्वरूप की आवश्यकता होती है। अर्जुन अब उस दिव्य शांति की तलाश में हैं जो केवल प्रेममयी भक्ति से मिलती है।