किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥
अर्जुन कहते हैं: मैं आपको पहले की तरह ही मुकुट धारण किए हुए तथा हाथ में गदा और चक्र लिए हुए देखना चाहता हूँ। हे विश्वमूर्ते! हे सहस्रबाहो! आप अपने उसी चतुर्भुज रूप में प्रकट हो जाइए।
विस्तृत व्याख्या: भगवान का अनंत रूपों वाला 'विश्वरूप' अत्यंत प्रभावशाली था, लेकिन अर्जुन के लिए वह डरावना भी था। अर्जुन कृष्ण के उस शांत और सौम्य रूप के आदी थे जिसे वे पहचानते थे। यहाँ 'चतुर्भुज' रूप का अर्थ है भगवान विष्णु का वह स्वरूप जो शांति और संरक्षण का प्रतीक है।
आध्यात्मिक मर्म: ज्ञान (विश्वरूप) महान है, लेकिन शांति और भक्ति (चतुर्भुज रूप) मन को स्थिरता देती है। जीवन में जब बहुत ज्यादा उलझनें (Complexity) हों, तो हमें सरलता (Simplicity) की ओर लौटना चाहिए।