मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥
मेरे इस प्रकार के इस विकराल रूप को देखकर तुझे व्यथा (पीड़ा) नहीं होनी चाहिए और न ही बुद्धि भ्रमित होनी चाहिए। तू भय रहित और प्रसन्न मन होकर मेरे उसी (चतुर्भुज) रूप को फिर से देख।
विस्तृत व्याख्या: भगवान कृष्ण एक सच्चे मित्र और गुरु की तरह अर्जुन का डर दूर कर रहे हैं। वे जानते हैं कि अर्जुन अब और अधिक मानसिक दबाव नहीं सह सकता। वे अर्जुन को वापस सामान्य स्थिति में लाना चाहते हैं ताकि वह शांत मन से अपना निर्णय ले सके।