॥ श्लोक 5 ॥

श्रीभगवानुवाच ।
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानी नानावर्णाकृतीनि च ॥

धार्मिक व्याख्या

श्रीभगवान बोले: हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों और हजारों नाना प्रकार के दिव्य रूपों को देख, जो अनेक रंगों और आकृतियों के हैं।

आध्यात्मिक मर्म: कृष्ण अर्जुन की प्रार्थना स्वीकार करते हैं। वे अपनी अनंतता प्रकट करने जा रहे हैं, जहाँ कोई सीमा नहीं है।

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