नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥
जैसा तूने मुझे अभी देखा है, इस प्रकार का (चतुर्भुज रूप वाला) मैं न तो वेदों के अध्ययन से, न कठिन तपस्या से, न दान से और न ही किसी प्रकार के यज्ञ-अनुष्ठान से देखा जा सकता हूँ।
विस्तृत व्याख्या: यहाँ भगवान उन भौतिक और धार्मिक साधनों की सीमा बता रहे हैं जिन्हें मनुष्य अक्सर पर्याप्त मान लेता है। वेदों का ज्ञान बुद्धि बढ़ा सकता है, तपस्या इंद्रियों को वश में कर सकती है और दान पुण्य बढ़ा सकता है, लेकिन ये सब मिलकर भी परमात्मा के वास्तविक साक्षात्कार की गारंटी नहीं देते। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि ईश्वर बाहरी प्रदर्शन से नहीं बल्कि आंतरिक योग्यता से प्राप्त होते हैं।