भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥
हे परन्तप अर्जुन! केवल 'अनन्य भक्ति' के द्वारा ही मैं इस प्रकार प्रत्यक्ष देखा जा सकता हूँ, तत्व से यथार्थ रूप में जाना जा सकता हूँ और मुझमें प्रवेश (एकीकृत होना) भी किया जा सकता है।
विस्तृत व्याख्या: यह श्लोक साधना का सर्वोच्च मार्ग बताता है—अनन्य भक्ति। 'अनन्य' का अर्थ है 'जिसका दूसरा कोई न हो' (No one else)। जब भक्त का मन संसार के किसी अन्य विषय में न भटककर केवल ईश्वर में स्थित हो जाता है, तब भगवान स्वयं उसे दर्शन देते हैं। यहाँ तीन क्रियाएं बताई गई हैं: जानना (Knowledge), देखना (Vision) और प्रवेश करना (Union)। ये तीनों केवल अनन्य प्रेममयी भक्ति से ही संभव हैं।