अर्जुन उवाच :
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ 12.1 ॥
अर्जुन बोले: जो भक्त निरंतर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आपकी (सगुण रूप की) उपासना करते हैं और जो अविनाशी निराकार ब्रह्म की उपासना करते हैं—इन दोनों प्रकार के योगियों में उत्तम योगी कौन है?
विस्तृत व्याख्या: अर्जुन यहाँ भक्ति मार्ग के दो मुख्य सिद्धांतों के बारे में पूछ रहे हैं। एक वे भक्त हैं जो भगवान को साकार रूप (जैसे कृष्ण, राम) में मानकर प्रेमपूर्वक उनकी सेवा करते हैं। दूसरे वे हैं जो भगवान को निराकार, अदृश्य और सर्वव्यापी ब्रह्म के रूप में ध्यान करते हैं। अर्जुन का प्रश्न यह है कि भगवान की दृष्टि में इन दोनों में से कौन सा मार्ग श्रेष्ठ और शीघ्र फलदायी है।