॥ अध्याय 12, श्लोक 10 ॥

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ 12.10 ॥

धार्मिक व्याख्या

यदि तू अभ्यास में भी असमर्थ है, तो मेरे निमित्त कर्म करने के ही परायण हो जा। इस प्रकार मेरे लिए कर्मों को करता हुआ भी तू मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को प्राप्त करेगा।

विस्तृत व्याख्या: यहाँ भगवान साधना का एक और सरल विकल्प दे रहे हैं। यदि कोई साधक मन को एकाग्र करने के अभ्यास में भी कठिनाई अनुभव करता है, तो उसे चाहिए कि वह अपने जीवन के समस्त कार्यों को 'ईश्वर का कार्य' समझकर करे। मंदिर की सेवा, परोपकार, या समाज की भलाई के कार्य भगवान की प्रसन्नता के लिए करना भी भक्ति ही है। जब कर्म का केंद्र स्वार्थ न होकर परमात्मा बन जाता है, तो वह कर्म ही मोक्ष का मार्ग बन जाता है।

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