अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥
जो पुरुष सब भूतों में द्वेषभाव से रहित, स्वार्थरहित प्रेमी और दयालु है तथा ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख-दुखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान है; जो निरंतर संतुष्ट है, योगी है, जिसका शरीर और इंद्रियां वश में हैं और जो मुझमें दृढ़ निश्चय वाला है—वह मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धि वाला मेरा भक्त मुझे प्रिय है।
विस्तृत व्याख्या: इन दो श्लोकों में भगवान उन गुणों की सूची दे रहे हैं जो एक साधक को सच्चा भक्त बनाते हैं। 'अद्वेष्टा' का अर्थ है किसी से घृणा न करना। भक्त वह है जो जानता है कि हर जीव में ईश्वर का वास है। वह केवल संतुष्ट ही नहीं रहता, बल्कि 'सततं योगी' है—यानी उसका मन हर समय भगवान से जुड़ा रहता है। जिसका मन और बुद्धि ईश्वर को समर्पित हो चुकी है, वही भगवान का सबसे प्यारा भक्त है।