॥ अध्याय 12, श्लोक 18-19 ॥

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गवर्जितः ॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥

धार्मिक व्याख्या

जो शत्रु और मित्र में, मान और अपमान में समान भाव रखता है; जो सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख आदि द्वंद्वों में सम है और आसक्ति से रहित है; जिसे निंदा और स्तुति समान लगती है, जो मननशील है, जो जिस किसी भी प्रकार से शरीर का निर्वाह होने पर संतुष्ट है, जिसका किसी स्थान (घर) में ममता का स्थान नहीं है और जिसकी बुद्धि स्थिर है—वह भक्तियुक्त पुरुष मुझे प्रिय है।

विस्तृत व्याख्या: इन श्लोकों में वैराग्य और समत्व की पराकाष्ठा बताई गई है। भक्त की दृष्टि में शत्रु और मित्र दोनों ही ईश्वर के रूप हैं। वह प्रशंसा सुनकर फूलता नहीं और बुराई सुनकर विचलित नहीं होता। 'अनिकेतः' का अर्थ है जिसका हृदय ही ईश्वर का घर है, इसलिए वह सांसारिक घरों या संपत्तियों में ममता नहीं रखता। वह मौन रहकर परमात्मा का मनन करता है और जो कुछ भी ईश्वर की इच्छा से मिल जाए, उसी में परम संतोष का अनुभव करता है।

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