ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ 12.3 ॥
परंतु जो अपनी इंद्रियों को वश में करके, उस अविनाशी, अनिर्वचनीय, निराकार, सर्वव्यापी, अचिन्त्य, विकाररहित, अचल और ध्रुव (शाश्वत) ब्रह्म की उपासना करते हैं...
विस्तृत व्याख्या: भगवान यहाँ निराकार उपासना के बारे में बता रहे हैं। वे उस परब्रह्म के स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं जो इंद्रियों से परे है। निराकार ब्रह्म वह है जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता (अनिर्देश्यम्), जिसका कोई भौतिक आकार नहीं है (अव्यक्तम्), जो हर जगह मौजूद है (सर्वत्रगम्) और जिसमें कभी कोई बदलाव नहीं आता (ध्रुवम्)।