॥ अध्याय 12, श्लोक 4 ॥

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ 12.4 ॥

धार्मिक व्याख्या

वे अपनी इंद्रियों के समूह को वश में करके, सभी परिस्थितियों में समान बुद्धि वाले और समस्त प्राणियों के कल्याण में लगे हुए लोग भी मुझको ही प्राप्त होते हैं।

विस्तृत व्याख्या: भगवान यहाँ निराकार उपासना करने वालों की साधना और उसके फल का वर्णन कर रहे हैं। निराकार ब्रह्म को प्राप्त करने के लिए तीन अनिवार्य शर्तें हैं: पहली, इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण; दूसरी, सुख-दुःख या लाभ-हानि में समभाव (समान बुद्धि); और तीसरी, प्राणी मात्र की सेवा का भाव। भगवान स्पष्ट कर रहे हैं कि मार्ग चाहे साकार हो या निराकार, यदि साधक का लक्ष्य शुद्ध है, तो वह अंततः परमात्मा में ही विलीन होता है।

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