ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ 12.6 ॥
परंतु जो भक्त अपने संपूर्ण कर्मों को मुझमें समर्पित करके, मेरे परायण होकर, अनन्य योग से मेरा ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं...
विस्तृत व्याख्या: इस श्लोक में सगुण भक्ति की विधि बताई गई है। भगवान कहते हैं कि आदर्श भक्त वह है जो अपने जीवन के प्रत्येक कार्य (खाना, पीना, काम करना) को ईश्वर की सेवा मानकर उन्हें समर्पित कर देता है। 'अनन्य योग' का अर्थ है कि उसके चित्त में ईश्वर के सिवाय और कोई दूसरा विचार या आसक्ति नहीं रह जाती। वह केवल भगवान को ही अपना परम लक्ष्य मानकर निरंतर ध्यान में मग्न रहता है।