तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ 12.7 ॥
हे पार्थ! मुझमें चित्त लगाने वाले उन प्रेमियों का मैं मृत्यु रूप संसार-सागर से शीघ्र ही उद्धार करने वाला (उद्धारकर्ता) बन जाता हूँ।
विस्तृत व्याख्या: इस श्लोक में भगवान अपने भक्तों को अभय दान दे रहे हैं। वे कहते हैं कि जो भक्त अपने मन को पूरी तरह मुझमें लीन कर देते हैं, उन्हें इस जन्म-मृत्यु के चक्र (संसार सागर) से पार होने के लिए खुद चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। जैसे एक पिता अपने बालक का हाथ पकड़कर उसे पार करा देता है, वैसे ही स्वयं भगवान उन भक्तों का उद्धार शीघ्र ही कर देते हैं।