मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ 12.8 ॥
मुझमें ही अपने मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को निवेश कर; इसके बाद तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
विस्तृत व्याख्या: यहाँ भगवान योग की परम अवस्था बता रहे हैं। मन और बुद्धि जब दोनों ही परमात्मा में स्थिर हो जाते हैं, तो भक्त का ईश्वर के साथ एकात्म हो जाता है। मन का स्वभाव है संकल्प-विकल्प करना और बुद्धि का स्वभाव है निश्चय करना। जब ये दोनों ही भगवान की सेवा और चिन्तन में लग जाते हैं, तब साधक देह में रहते हुए भी आध्यात्मिक रूप से ईश्वर में ही वास करता है।