अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥ 12.9 ॥
यदि तू चित्त को मुझमें अचल (स्थिर) करने में समर्थ नहीं है, तो हे धनञ्जय! अभ्यास योग के द्वारा मुझे प्राप्त करने की इच्छा कर।
विस्तृत व्याख्या: भगवान यहाँ एक करुणामयी गुरु की तरह विकल्प दे रहे हैं। यदि मन चंचल होने के कारण तुरंत स्थिर नहीं हो पा रहा है, तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है। 'अभ्यास योग' का अर्थ है बार-बार मन को संसार से खींचकर भगवान के नाम, रूप और लीलाओं में लगाने का प्रयत्न करना। निरंतर अभ्यास से मन की चंचलता समाप्त होती है और अंततः वह ईश्वर में स्थिर हो जाता है।