॥ अध्याय 13, श्लोक 1 ॥

श्रीभगवानुवाच :
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ 13.1 ॥

धार्मिक व्याख्या

श्रीभगवान बोले: हे कुन्तीपुत्र! यह शरीर 'क्षेत्र' (खेत) के नाम से कहा जाता है और जो इसे जानता है, उसको 'क्षेत्रज्ञ' (जानने वाला) ऐसा उन दोनों के तत्व को जानने वाले विद्वान कहते हैं।

विस्तृत व्याख्या: यहाँ से भगवान प्रकृति और पुरुष के भेद को समझाना आरम्भ करते हैं। 'क्षेत्र' का अर्थ है वह स्थान जहाँ कर्म बोए और काटे जाते हैं—अर्थात हमारा शरीर और मन। जैसे किसान खेत में काम करता है, वैसे ही आत्मा इस शरीर के माध्यम से कर्म करती है। 'क्षेत्रज्ञ' वह चेतना या आत्मा है जो इस शरीर के होने और इसकी क्रियाओं को जानती है। शरीर नश्वर है, पर उसे जानने वाली आत्मा शाश्वत है।

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