॥ अध्याय 13, श्लोक 15 ॥

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ 13.15 ॥

धार्मिक व्याख्या

वह चराचर सब भूतों के बाहर और भीतर भी परिपूर्ण है और चर-अचर (चलने वाले और स्थिर) भी वही है। सूक्ष्म होने के कारण वह 'अविज्ञेय' (न जानने योग्य) है तथा वह बहुत दूर भी है और अत्यंत समीप भी है।

विस्तृत व्याख्या: परमात्मा की स्थिति जल में घुले नमक की तरह है, जो दिखता नहीं पर सब जगह है। वह हमारे शरीर के भीतर आत्मा रूप में है और बाहर ब्रह्मांड रूप में। अज्ञानी के लिए वह करोड़ों मील दूर है, लेकिन भक्त और ज्ञानी के लिए वह अपने हृदय के भीतर ही है। वह इतना सूक्ष्म है कि आँखों या बुद्धि से उसे पकड़ा नहीं जा सकता, उसे केवल अनुभव किया जा सकता है।

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