अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयम् ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ 13.16 ॥
वह परमात्मा विभाग रहित (एक) होने पर भी सब प्राणियों में अलग-अलग विभक्त सा स्थित प्रतीत होता है। उस जानने योग्य परमात्मा को ही सब भूतों को धारण-पोषण करने वाला, संहार करने वाला और फिर से उत्पन्न करने वाला जानना चाहिए।
विस्तृत व्याख्या: जैसे आकाश एक ही है, लेकिन अलग-अलग घड़ों के भीतर वह अलग-अलग 'घटाकाश' जैसा प्रतीत होता है, वैसे ही एक ही परमात्मा सब मनुष्यों और जीवों में अलग-अलग जीवात्मा जैसा दिखता है। वह सृष्टि का आदि, मध्य और अंत है—वही पालनकर्ता (विष्णु), संहारकर्ता (रुद्र) और सृजनकर्ता (ब्रह्मा) के रूप में कार्य करता है।