ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥ 13.17 ॥
वह ब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति (परम प्रकाश) है और अज्ञान रूप अंधकार से अत्यंत परे कहा जाता है। वह परमात्मा ज्ञान स्वरूप है, जानने योग्य (ज्ञेय) है और ज्ञान के माध्यम से ही प्राप्त होने वाला है तथा सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है।
विस्तृत व्याख्या: जैसे सूर्य सब कुछ प्रकाशित करता है, वैसे ही वह परमात्मा सूर्य, चंद्रमा और अग्नि को भी शक्ति (प्रकाश) प्रदान करता है। वह अज्ञान के अंधकार से मुक्त शुद्ध प्रकाश है। यहाँ 'ज्ञानगम्यं' का अर्थ है कि उसे तर्क से नहीं, बल्कि श्लोक 7-11 में बताए गए ज्ञान के लक्षणों (जैसे अहिंसा, विनम्रता) से ही पाया जा सकता है। वह कहीं बाहर नहीं, बल्कि हर जीव के हृदय में अंतर्यामी रूप में बैठा है।