इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ 13.18 ॥
इस प्रकार क्षेत्र (शरीर), ज्ञान (साधना) और ज्ञेय (परमात्मा) का स्वरूप संक्षेप में कहा गया। मेरा भक्त इस तत्व को जानकर मेरे ही भाव (परम पद) को प्राप्त होता है।
विस्तृत व्याख्या: यहाँ भगवान ने अब तक की चर्चा का सारांश दिया है। उन्होंने शरीर (क्षेत्र), उसे जानने की विधि (ज्ञान) और अंतिम लक्ष्य (ज्ञेय) को स्पष्ट कर दिया है। भगवान कहते हैं कि जो भक्त इस त्रिकोण (क्षेत्र-ज्ञान-ज्ञेय) को समझ लेता है, वह माया के बंधनों को तोड़कर साक्षात भगवान के दिव्य स्वरूप में लीन होने की योग्यता प्राप्त कर लेता है।