क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ 13.2 ॥
हे भारत! तू संपूर्ण क्षेत्रों (शरीरों) में क्षेत्रज्ञ (जानने वाला) भी मुझे ही जान। और क्षेत्र तथा क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही मेरे मत में वास्तविक ज्ञान है।
विस्तृत व्याख्या: भगवान यहाँ एक गहरा रहस्य खोल रहे हैं। यद्यपि प्रत्येक शरीर में एक जीवात्मा (क्षेत्रज्ञ) है, लेकिन उन सभी शरीरों के भीतर रहने वाला जो 'परम ज्ञाता' है, वह साक्षात परमात्मा ही है। भगवान स्पष्ट करते हैं कि शरीर (जड़) और आत्मा (चेतन) के अंतर को समझ लेना ही वास्तविक ज्ञान है। संसार की बाकी सभी विद्याएं भौतिक हो सकती हैं, पर यह आत्म-ज्ञान ही परम सत्य है।