॥ अध्याय 13, श्लोक 23 ॥

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ 13.23 ॥

धार्मिक व्याख्या

जो मनुष्य इस प्रकार पुरुष (आत्मा) को और गुणों सहित प्रकृति को तत्व से जानता है, वह सब प्रकार से कर्म करता हुआ भी फिर से जन्म नहीं लेता।

विस्तृत व्याख्या: यह ज्ञान की महिमा है। जो व्यक्ति यह भेद समझ लेता है कि मैं शरीर नहीं, बल्कि शुद्ध आत्मा हूँ और शरीर की क्रियाएं प्रकृति के गुणों द्वारा हो रही हैं, वह कर्म-बंधन से मुक्त हो जाता है। ऐसा ज्ञानी पुरुष संसार के अपने कर्तव्यों का पालन (वर्तमानोऽपि) करते हुए भी भीतर से अलिप्त रहता है, इसलिए उसे मृत्यु के बाद पुनः जन्म लेकर दुखों को नहीं भोगना पड़ता।

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