अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ 13.25 ॥
परंतु इनसे दूसरे (अर्थात मंद बुद्धि वाले) पुरुष इस प्रकार न जानते हुए दूसरों से (तत्वज्ञानी पुरुषों से) सुनकर ही उपासना करते हैं और वे श्रवणपरायण पुरुष भी मृत्यु रूप संसार को निश्चय ही पार कर जाते हैं।
विस्तृत व्याख्या: यह श्लोक बहुत ही आशावादी है। भगवान कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति स्वयं शास्त्रों का ज्ञाता नहीं है या कठिन साधना नहीं कर सकता, लेकिन वह श्रद्धापूर्वक गुरुओं और महापुरुषों से सत्य को सुनता है और उस पर अमल करता है (श्रवण भक्ति), तो वह भी मोक्ष का अधिकारी है। केवल सत्य को सुनना और उस पर अटूट विश्वास रखना भी मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त करने के लिए पर्याप्त है।