॥ अध्याय 13, श्लोक 26 ॥

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ 13.26 ॥

धार्मिक व्याख्या

हे भरतश्रेष्ठ! इस संसार में जो कुछ भी स्थावर (स्थिर) या जंगम (चलने वाला) प्राणी उत्पन्न होता है, वह सब 'क्षेत्र' (जड़) और 'क्षेत्रज्ञ' (चेतन) के संयोग से ही उत्पन्न होता है, ऐसा तू जान।

विस्तृत व्याख्या: यहाँ भगवान सृष्टि निर्माण का सूत्र बता रहे हैं। संसार में कोई भी जीव या पदार्थ केवल जड़ (Matter) से या केवल चेतना (Soul) से नहीं बना है। जब प्रकृति और पुरुष का मिलाप होता है, तभी जीवन प्रकट होता है। जैसे बिजली के बिना बल्ब नहीं जल सकता और बल्ब के बिना बिजली का प्रकाश नहीं दिख सकता, वैसे ही शरीर और आत्मा के मिलन से ही यह चराचर जगत अस्तित्व में आता है।

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