समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ 13.27 ॥
जो पुरुष नष्ट होने वाले सब भूतों में परमेश्वर को समभाव से स्थित और अविनाशी देखता है, वही वास्तव में सही देखता है।
विस्तृत व्याख्या: यहाँ 'स पश्यति' का अर्थ है कि वही व्यक्ति वास्तव में ज्ञानी है। शरीर मरता है, पेड़ सूखते हैं, पशु मरते हैं—ये सब 'विनाशी' हैं। लेकिन जो इन सबके भीतर उस एक 'अविनाशी' परमात्मा को देख लेता है, वही सत्य को जानता है। यह श्लोक सिखाता है कि हमें बाहरी भेदों को छोड़कर भीतर की एकता को देखना चाहिए।