प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥ 13.29 ॥
जो पुरुष संपूर्ण कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति द्वारा ही किए जाते हुए देखता है और आत्मा को अकर्ता देखता है, वही वास्तव में देखता है।
विस्तृत व्याख्या: यह श्लोक कर्म-बंधन से बचने की कला सिखाता है। हमारे शरीर, मन और बुद्धि द्वारा जो भी क्रियाएं होती हैं, वे प्रकृति के गुणों के कारण होती हैं। शुद्ध आत्मा केवल इनका दृष्टा (Witness) है। जब मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' वाला अहंकार छोड़ देता है, तो वह कर्मों के अच्छे-बुरे फल से मुक्त हो जाता है। जो अपनी आत्मा को इन क्रियाओं से अलिप्त और अकर्ता मानता है, वही ज्ञानी है।