तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु ॥ 13.3 ॥
वह क्षेत्र क्या है, उसका स्वरूप क्या है, उसमें क्या-क्या विकार (बदलाव) होते हैं और वह किन कारणों से पैदा हुआ है; तथा वह क्षेत्रज्ञ कौन है और उसका क्या प्रभाव है—यह सब तू संक्षेप में मुझसे सुन।
विस्तृत व्याख्या: इस श्लोक में भगवान आगे आने वाले उपदेश की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं। वे अर्जुन को सावधान कर रहे हैं कि अब वे प्रकृति (शरीर) के तत्वों, उसमें होने वाले परिवर्तनों (जन्म, वृद्धि, मृत्यु) और आत्मा की शक्तियों का विस्तार से वर्णन करेंगे।